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अपनी बात

यह थोडे़ होते हुए भी पात्र के प्रभाव से...

जल में तेल, दुष्ट मनुष्य में कोई गुप्त बात, सुपात्र में थोडा़ भी दान और समझदार मनुष्य के पास शास्त्र, यह थोडे़ होते हुए भी पात्र के प्रभाव से तुरंत फैल जाते हैं।

राजा का कर्तव्य है कि वे ...

ब्राह्मणों का बल विद्या है, राजाओं का बल उनकी सेना है, वैश्यों का बल उनका धन है और शूद्रों का बल दूसरों की सेवा करना है। ब्राह्मणों का कर्तव्य है कि वे विद्या ग्रहण करें। राजा का कर्तव्य है कि वे सैनिकों द्वारा अपने बल को बढ़ाते रहें। वैश्यों का कर्तव्य है कि वे व्यापार द्वारा धन बढ़ाएँ, शूद्रों का कर्तव्य श्रेष्ठ लोगों की सेवा करना है।

एक अंधे व्यक्ति के लिए आईना...

किसी मूर्ख व्यक्ति के लिए किताबें उतनी ही उपयोगी हैं जितना कि एक अंधे व्यक्ति के लिए आईना.

गुणी व्यक्तियों से ही कुल की ..

बचपन में संतान को जैसी शिक्षा दी जाती है, उनका विकास उसी प्रकार होता है। इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे उन्हें ऐसे मार्ग पर चलाएँ, जिससे उनमें उत्तम चरित्र का विकास हो क्योंकि गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा बढ़ती है।

अनुभूति आपका इश्वर है ....

भगवान मूर्तियों में नहीं है,आपकी अनुभूति आपका इश्वर है,आत्मा आपका मंदिर है.

कार सज्जन पुरुष ...

जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं मिलती, सभी हाथियों के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होता, सभी वनों में चंदन का वृक्ष नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन पुरुष सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।

स्वयम से तीन प्रश्न कीजिये ...

कोई काम शुरू करने से पहले, स्वयम से तीन प्रश्न कीजिये . मैं ये क्यों कर रहा हूँ, इसके परिणाम क्या हो सकते हैं और क्या मैं सफल होऊंगा. और जब गहरई से सोचने पर इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर मिल जायें, तभी आगे बढें !

शिक्षित व्यक्ति हर जगह ...

शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है.एक शिक्षित व्यक्ति हर जगह सम्मान पता है.

मनुष्य का जन्म बहुत सौभाग्य से मिलता है ...

शिक्षा और अध्ययन की महत्ता बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य का जन्म बहुत सौभाग्य से मिलता है, इसलिए हमें अपने अधिकाधिक समय का वेदादि शास्त्रों के अध्ययन में तथा दान जैसे अच्छे कार्यों में ही सदुपयोग करना चाहिए ।

बुद्धिमान व्यक्ति.....

बुद्धिमान व्यक्ति को बार - बार यह सोचना चाहिए कि हमारे मित्र कितने हैं, हमारा समय कैसा हैं - अच्छा हैं या बुरा हैं और यदि बुरा हैं, तो उसे अच्छा कैंसे बनाया जाए, हमारा निवास स्थान कैसा हैं, हमारी आय कितनी हैं और व्यय कितना हैं, मैं कौन हू - आत्मा हू अथवा शरीर हू, स्वाधीन हू अथवा पराधीन तथा मेरी शक्ति कितनी हैं ।

संतोष नन्दन वन के समान है ....

संतोष नन्दन वन के समान है। मनुष्य अगर अपने अन्दर उसे स्थापित करे तो उसे वैसे ही सुख मिलेगा जैसे नन्दन वन में मिलता है।

अपने ईमान और धर्म बेचकर कमाया गया धन ...

अपने ईमान और धर्म बेचकर कमाया गया धन अपने किसी काम का नहीं होता । अतः उसका त्याग करें । आपके लिए यही उत्तम है ।

क्रोध यमराज के समान है

क्रोध यमराज के समान है, उसके कारण मनुष्य मृत्यु की गोद में चला जाता है ।

तृष्णा वैतरणी नदी की तरह है जिसके कारण मनुष्य को सदैव कष्ट उठाने पड़ते है ।

विद्या कामधेनु के समान है । मनुष्य अगर भलीभांति शिक्षा प्राप्त करे तो वह

कहीं भी और कभी भी फल प्रदान कर सकती है ।

किताबें उतनी ही उपयोगी हैं ...

किसी मूर्ख व्यक्ति के लिए किताबें उतनी ही उपयोगी हैं जितना कि एक अंधे व्यक्ति के लिए आईना

जिस प्रकार मिट्‌टी में तो पुष्पों की सगन्ध आ जाती है

सत्सग्ड़ाद भवति ही साधता खलानाम ।
साधूनां नैव खलसग्डक्तः खलत्वम ।
अमोदं कसमभवं मदवे घने ।
मृदगन्धं न हि क समानि धारयन्ति ।

जिस प्रकार मिट्‌टी में तो पुष्पों की सगन्ध आ जाती है, परंत पुष्पों में मिट्‌टी

की सगन्ध नहीं आती, उसी प्रकार सज्जनों के संग से दुस्ट तो कभी - कभार
सुधर जाते हैं, परंतु उन दुर्जनों की संगति में सज्जनों को कोई हानि नहीं होती,
अर्थात वे दुस्टता को अंशामात्र भी नहीं अपनाते, अपित अपनी साधता को स्थिर
बनाये रखते हैं ।

जैसे ही भय आपके करीब आये ...

जैसे ही भय आपके करीब आये, उसपर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दीजिये.

जिस प्रकार नीम के वृक्ष की जड़

जिस प्रकार नीम के वृक्ष की जड़ को दूध और घी से सींचने पर भी

नीम का वृक्ष अपना कड वापन छोड कर मीठा नहीं हो जाता, उसी प्रकार

दुर्जन को कितने उपायों से कितना ही सिखाने की चेष्टा क्यों न की जाये,

वह अपनी दुर्जनता को छोड कर साधुता को कभी नहीं अपनाता । अतः दुर्जन

को समझाने बुझाने तथा सुधारने की चेष्टा करना व्यर्थ ही है ।

आत्मा आपका मंदिर है...

भगवान मूर्तियों में नहीं है,आपकी अनुभूति आपका इश्वर है,आत्मा आपका मंदिर है.

आत्म - कल्याण

आत्म - कल्याण के इच्छुक व्यक्ति को दुर्जनों की संगति तत्काल छोड़ देनी चाहिए और साधु - पुरूसों का संग कराना चाहिए । उसे इस संसार में प्रतिदिन कोई न कोई पुण्य कार्य करते रहना चाहिए । वस्तुतः बुद्धिमान व्यक्ति को इस अनित्य ओर नाच्चवान संसार में परित्याग करके नित्य एवं द्राुद्ध ब्रहृमा परमेच्च्वर का ही निरन्तर स्मरण करना चाहिए ।

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